Priya Sharma
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भारत में जब चुनाव की बात होती है तो सबसे पहले लोकसभा चुनाव का नाम आता है. लेकिन संसद में सिर्फ लोकसभा ही नहीं है. संसद के दो सदन हैं लोकसभा और राज्यसभा. दोनों की भूमिका अलग है और दोनों के सदस्यों को चुनने का तरीका भी अलग है. लोकसभा में जनता सीधे अपने क्षेत्र के उम्मीदवार को वोट देती है. जिस उम्मीदवार को उस क्षेत्र में सबसे ज्यादा वोट मिलते हैं, वह सांसद बनता है. दूसरी ओर राज्यसभा के ज्यादातर सदस्यों को आम जनता सीधे वोट नहीं देती. उन्हें राज्यों की विधानसभा के चुने हुए विधायक चुनते हैं.
यही अंतर लोकसभा और राज्यसभा के चुनाव को एक-दूसरे से अलग बनाता है. आइए आसान भाषा में समझते हैं कि राज्यसभा सांसद के चुनाव की शुरुआत कहां से होती है, उम्मीदवार कैसे मैदान में आता है, वोट कैसे पड़ते हैं, वोटों की गिनती कैसे होती है और आखिर सांसद कैसे चुना जाता है.
भारत की संसद में राज्यसभा को राज्यों की परिषद कहा जाता है. लोकसभा में देश के अलग-अलग इलाकों से चुने हुए प्रतिनिधि आते हैं. राज्यसभा में राज्यों और कुछ केंद्र शासित प्रदेशों (Union Territories) का प्रतिनिधित्व होता है. दोनों सदनों के सांसद संसद में कानून बनाने, सरकार के काम पर चर्चा करने और देश से जुड़े बड़े मुद्दों पर अपनी बात रखने में भूमिका निभाते हैं. हालांकि दोनों सदनों के चुनाव का तरीका अलग है.
राज्यसभा का चुनाव लोकसभा से बिल्कुल अलग तरीके से होता है. सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि राज्यसभा एक स्थायी सदन है. इसका मतलब यह है कि राज्यसभा को लोकसभा की तरह भंग नहीं किया जाता. राज्यसभा के सदस्य छह साल के लिए चुने जाते हैं. लगभग एक-तिहाई सदस्य हर दो साल में अपना कार्यकाल पूरा करते हैं. उनकी जगह नई नियुक्ति या चुनाव की प्रक्रिया होती है. इसी वजह से राज्यसभा के लिए पूरे देश में एक साथ चुनाव नहीं होता. किसी राज्य की जितनी सीटों पर सदस्यों का कार्यकाल पूरा होने वाला होता है, वहां उन सीटों को भरने के लिए चुनाव कराया जाता है.
यही वह जगह है जहां लोकसभा और राज्यसभा चुनाव का सबसे बड़ा अंतर दिखाई देता है. राज्यसभा के निर्वाचित सदस्यों को उस राज्य की विधानसभा के निर्वाचित विधायक चुनते हैं. आम मतदाता राज्यसभा उम्मीदवार को सीधे वोट नहीं देता. मतदाता पहले विधानसभा चुनाव में विधायक चुनता है. बाद में वही निर्वाचित विधायक राज्यसभा चुनाव में अपने राज्य के उम्मीदवारों के लिए वोट करते हैं. संविधान के अनुच्छेद 80 के अनुसार राज्यसभा के निर्वाचित सदस्यों का चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व यानी Proportional Representation की व्यवस्था के तहत Single Transferable Vote यानी एकल संक्रमणीय मत से होता है.
नाम सुनने में यह मुश्किल लगता है, लेकिन इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है. मान लीजिए किसी राज्य में राज्यसभा की तीन सीटों के लिए चुनाव हो रहा है. विधायक के पास एक वोट होता है, लेकिन वह उम्मीदवारों के लिए अपनी पसंद का क्रम बता सकता है.
राज्यसभा चुनाव में यही व्यवस्था Single Transferable Vote कहलाती है.
यहीं से राज्यसभा चुनाव की गिनती थोड़ी अलग हो जाती है. मान लीजिए किसी उम्मीदवार को जीतने के लिए जितने वोट चाहिए, उससे ज्यादा वोट मिल गए. तब उसके कुछ वोट जरूरत से ज्यादा हो सकते हैं. दूसरी स्थिति यह हो सकती है कि कोई उम्मीदवार इतना पीछे रह जाए कि उसके जीतने की संभावना ही न बचे. ऐसी परिस्थितियों में चुनाव के नियमों के अनुसार वोट अगली पसंद वाले उम्मीदवार तक पहुंच सकते हैं. इसी कारण इसे एकल संक्रमणीय मत कहा जाता है. राज्यसभा के आधिकारिक दस्तावेज के अनुसार वोट का ट्रांसफर उम्मीदवार के जरूरत से ज्यादा वोट पाने या किसी उम्मीदवार के आगे बढ़ने की स्थिति में नहीं रहने जैसी परिस्थितियों में होता है.
राज्यसभा चुनाव में एक निश्चित कोटा होता है. कोटा का मतलब है किसी उम्मीदवार को निर्वाचित होने के लिए कितने वोटों की जरूरत है. यह संख्या इस बात पर निर्भर करती है कि कितनी सीटों पर चुनाव हो रहा है और कितने वैध वोट हैं. मतगणना के दौरान पहले उम्मीदवारों को उनकी पहली पसंद के वोट मिलते हैं. अगर कोई उम्मीदवार जरूरी कोटा हासिल कर लेता है, तो वह निर्वाचित हो जाता है. इसके बाद अगर किसी उम्मीदवार के पास जरूरत से ज्यादा वोट हैं या कोई उम्मीदवार आगे नहीं जा सकता, तो नियमों के मुताबिक अगली पसंद के वोटों का ट्रांसफर किया जा सकता है. इसलिए राज्यसभा की मतगणना सिर्फ यह देखने की प्रक्रिया नहीं है कि किसे सबसे ज्यादा वोट मिले. इसमें उम्मीदवारों की पसंद और वोटों के ट्रांसफर का भी हिसाब रखा जाता है.
राज्यसभा चुनाव में विधायक उम्मीदवारों के सामने 1, 2, 3 और आगे के अंक लगाकर अपनी पसंद बताते हैं.
जरूरी नहीं कि विधायक सभी उम्मीदवारों के सामने नंबर लिखे. वह अपनी पसंद के उम्मीदवारों के सामने प्राथमिकता दर्ज करता है. वोट को वैध रखने के लिए निर्धारित तरीके से प्राथमिकता अंकित करना जरूरी होता है.
राज्यसभा चुनाव में ओपन बैलेट की व्यवस्था है. इसका मतलब यह नहीं है कि आम जनता विधायक का वोट देख सकती है. इस व्यवस्था में राजनीतिक दल के अधिकृत एजेंट को यह देखने की अनुमति होती है कि उसके दल के विधायक ने अपना वोट किस तरह चिह्नित किया है. इसके लिए चुनाव नियमों में अलग प्रक्रिया दी गई है. इस व्यवस्था का उद्देश्य राज्यसभा चुनाव में पार्टी के विधायकों के मतदान से जुड़ी पारदर्शिता बनाए रखना है.
नहीं… राज्यसभा में कुछ सदस्य निर्वाचित होते हैं और 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किए जाते हैं. संविधान के अनुसार इन मनोनीत सदस्यों को साहित्य, विज्ञान, कला और सामाजिक सेवा जैसे क्षेत्रों में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव रखने वाले लोगों में से चुना जाता है. राज्यसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 250 हो सकती है. निर्वाचन आयोग के अनुसार वर्तमान व्यवस्था में राज्यसभा की संख्या 245 है, जिसमें 233 निर्वाचित और 12 मनोनीत सदस्य हैं.
लोकसभा और राज्यसभा की प्रकृति अलग है. लोकसभा का सामान्य कार्यकाल पांच साल है और विशेष परिस्थितियों में इसे पहले भी भंग किया जा सकता है. राज्यसभा को भंग नहीं किया जाता. इसके सदस्य छह साल के लिए चुने जाते हैं और हर दो साल में लगभग एक-तिहाई सदस्य रिटायर होते हैं. इसलिए राज्यसभा की सीटों के चुनाव अलग-अलग समय पर होते रहते हैं. यही कारण है कि जब लोकसभा का आम चुनाव हो रहा होता है, तब जरूरी नहीं कि उसी समय सभी राज्यसभा सीटों के लिए भी चुनाव हो.
भारत में संसद के चुनाव कराने की जिम्मेदारी भारत निर्वाचन आयोग यानी Election Commission of India की है. आयोग लोकसभा और राज्यसभा चुनावों के साथ-साथ विधानसभा, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव भी कराता है. चुनाव आयोग की जिम्मेदारी सिर्फ मतदान कराने तक सीमित नहीं है. चुनाव कार्यक्रम तय करना, मतदाता सूची से जुड़ी व्यवस्था, नामांकन प्रक्रिया, चुनाव अधिकारियों की तैनाती, पर्यवेक्षकों की नियुक्ति, मतदान केंद्रों की व्यवस्था, मतगणना और चुनाव से जुड़े नियमों की निगरानी भी चुनाव प्रक्रिया का हिस्सा है. आयोग मतदाताओं को चुनाव प्रक्रिया समझाने के लिए जागरूकता कार्यक्रम भी चलाता है. इसका प्रमुख कार्यक्रम SVEEP यानी Systematic Voters’ Education and Electoral Participation है.
वोट डालने के लिए सिर्फ वोटर आईडी कार्ड होना ही पर्याप्त नहीं है. सबसे जरूरी बात यह है कि मतदाता का नाम संबंधित मतदाता सूची में होना चाहिए. निर्वाचन आयोग मतदाताओं को अपनी जानकारी और मतदान केंद्र की जानकारी जांचने की सुविधा देता है. मतदाता अपने मतदान केंद्र की जानकारी निर्वाचन आयोग की वेबसाइट या Voter Helpline के जरिए देख सकता है. इसलिए चुनाव से पहले मतदाता के लिए यह जांच लेना जरूरी होता है कि उसका नाम मतदाता सूची में है और जानकारी सही है.
हर चुनाव में यह जरूरी नहीं कि अंतिम समय तक कई उम्मीदवार मैदान में रहें. अगर नामांकन वापस लेने की प्रक्रिया के बाद किसी सीट पर केवल एक वैध उम्मीदवार बचता है और नियमों के अनुसार मतदान की जरूरत नहीं रहती, तो उस उम्मीदवार को निर्वाचित घोषित किया जा सकता है. ऐसी स्थिति में मतदाताओं को वोट डालने की जरूरत नहीं पड़ती. यह व्यवस्था लोकसभा और राज्यसभा दोनों तरह के चुनावों में लागू होने वाली चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा हो सकती है, हालांकि वास्तविक स्थिति संबंधित चुनाव और नियमों पर निर्भर करती है.
लोकसभा में परिणाम समझना अपेक्षाकृत आसान है. एक सीट पर जितने उम्मीदवारों को वोट मिले, उनकी गिनती होती है. सबसे ज्यादा वोट पाने वाला उम्मीदवार विजेता घोषित होता है. राज्यसभा में प्रक्रिया अलग है. यहां पहली पसंद के वोटों से गिनती शुरू होती है. उम्मीदवारों को जरूरी कोटा हासिल करना होता है. जरूरत पड़ने पर वोट अगली पसंद वाले उम्मीदवारों को ट्रांसफर किए जाते हैं. यह प्रक्रिया तब तक चल सकती है, जब तक उपलब्ध सीटों के लिए जरूरी उम्मीदवार निर्वाचित न हो जाएं.
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