Priya Sharma
Read More
---विज्ञापन---
राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में पहले जानकारी मिलना हमेशा बहुत जरूरी होता है. इसी जरूरत के लिए दुनिया के कई देशों में ऐसी खुफिया एजेंसियां हैं, जो अपने देश की सीमाओं के बाहर होने वाली जरूरी गतिविधियों पर नजर रखती हैं. भारत में इस जिम्मेदारी का प्रमुख नाम है Research and Analysis Wing यानी R&AW, जिसे आम बोलचाल में ‘रॉ’ कहा जाता है. रॉ भारत की बाहरी खुफिया एजेंसी है. इसका काम विदेशों से जुड़ी ऐसी जानकारी जुटाना और उसका आकलन करना है, जो भारत की सुरक्षा, विदेश नीति या दूसरे महत्वपूर्ण हितों पर असर डाल सकती है. R&AW की शुरुआत 21 सितंबर 1968 को हुई थी. इसके पहले प्रमुख आर.एन. काओ यानी Rameshwar Nath Kao थे. लेकिन भारत को ऐसी अलग एजेंसी की जरूरत क्यों पड़ी? इसकी कहानी 1962 के भारत-चीन युद्ध से जुड़ी है.
आजादी के बाद भारत की प्रमुख खुफिया संस्था Intelligence Bureau यानी IB थी. IB देश के अंदर की सुरक्षा से जुड़ी जानकारी जुटाने के साथ विदेशों से जुड़ी खुफिया जानकारी पर भी काम करती थी. उस समय भारत के पास विदेशों पर विशेष ध्यान देने वाली अलग खुफिया एजेंसी नहीं थी.
इस युद्ध ने भारत की सुरक्षा व्यवस्था के सामने कई सवाल खड़े किए. चीन की सैन्य तैयारियों और उसके इरादों का सही अंदाजा समय रहते नहीं लग पाया. इसके बाद विदेशों से जुड़ी खुफिया जानकारी के लिए एक अलग और विशेषज्ञ संस्था की जरूरत महसूस हुई. 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद भी इस जरूरत को और गंभीरता से देखा गया. आखिरकार 1968 में भारत ने अपनी अलग बाहरी खुफिया एजेंसी बनाने का फैसला किया.
21 सितंबर 1968 को Research and Analysis Wing यानी R&AW अस्तित्व में आई. इस नई एजेंसी की जिम्मेदारी आर.एन. काओ को दी गई. काओ पहले Intelligence Bureau में काम कर चुके थे और विदेशी मामलों से जुड़ी खुफिया जानकारी का अनुभव रखते थे. अब उनके सामने एक नई एजेंसी को शुरू से खड़ा करने की चुनौती थी. शुरुआती दौर में रॉ का ध्यान खास तौर पर चीन और पाकिस्तान से जुड़ी जानकारी जुटाने पर रहा. पड़ोसी देशों में होने वाले राजनीतिक और सैन्य बदलावों को समझना भी इसकी प्राथमिकताओं में शामिल था.
रॉ का काम सिर्फ ‘जासूसी’ करना नहीं है. आसान भाषा में कहें तो इसका काम भारत के खिलाफ देश के अंदर और बाहर होने वाली महत्वपूर्ण गतिविधियों से जुड़ी जानकारी हासिल करना और फिर उसका मतलब समझना है.
जैसे- किसी दूसरे देश की सेना क्या तैयारी कर रही है, वहां राजनीतिक हालात किस दिशा में जा रहे हैं, कोई आतंकी नेटवर्क भारत के खिलाफ सक्रिय हो रहा है या किसी देश की गतिविधि भारत की सुरक्षा को प्रभावित कर सकती है ये सभी बातें महत्वपूर्ण हो सकती हैं. यानी सिर्फ जानकारी मिलना काफी नहीं है. यह समझना भी जरूरी है कि उस जानकारी का भारत पर क्या असर पड़ सकता है और आगे क्या स्थिति बन सकती है. रॉ के बहुत से काम गोपनीय होते हैं. इसलिए उसकी पूरी कार्यप्रणाली या हर अभियान की जानकारी सार्वजनिक नहीं होती.
R&AW के गठन के केवल तीन साल बाद भारत-पाकिस्तान युद्ध हुआ. 1971 का युद्ध रॉ के शुरुआती इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है. उस समय पूर्वी पाकिस्तान में राजनीतिक संकट गहराता जा रहा था. हिंसा बढ़ रही थी और बड़ी संख्या में लोग भारत पहुंच रहे थे. ऐसे हालात में पाकिस्तान की राजनीतिक और सैन्य गतिविधियों की जानकारी भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण थी. नवंबर 1971 में आर.एन. काओ की टीम को पाकिस्तान के भीतर से ऐसी जानकारी मिली थी, जिसमें भारतीय एयरबेस पर संभावित हमले का संकेत था. यह सूचना भारतीय पक्ष तक पहुंचाई गई और भारतीय वायुसेना को तैयारी का समय मिला. इसके बाद 3 दिसंबर को पाकिस्तान ने भारतीय एयरबेस पर हमला किया. 16 दिसंबर को ढाका में पाकिस्तानी सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया.
हालांकि 1971 के युद्ध की पूरी सफलता को केवल रॉ की जानकारी से जोड़ना सही नहीं होगा. इसमें भारतीय सेना की कार्रवाई, कूटनीति, राजनीतिक हालात और जमीन पर बदलती परिस्थितियों की भी बड़ी भूमिका थी.लेकिन इस घटना से यह जरूर समझ आता है कि समय पर मिली खुफिया जानकारी किसी देश की तैयारी में कितनी अहम हो सकती है. दुनिया की दूसरी बड़ी बाहरी खुफिया एजेंसियां कौन-सी हैं? विदेशों से जुड़ी खुफिया जानकारी जुटाने का काम सिर्फ भारत में नहीं होता. अलग-अलग देशों ने अपनी जरूरतों के हिसाब से ऐसी एजेंसियां बनाई हैं. इनके नाम और काम करने का तरीका अलग हो सकता है.
CIA यानी Central Intelligence Agency अमेरिका की प्रमुख विदेशी खुफिया एजेंसी है. इसका काम दूसरे देशों और अंतरराष्ट्रीय घटनाओं से जुड़ी जानकारी जुटाना, उसका विश्लेषण करना और यह जानकारी अमेरिकी नीति-निर्माताओं तक पहुंचाना है. CIA के मुताबिक, एजेंसी विदेशी खुफिया जानकारी जुटाने के साथ उसका विश्लेषण करती है. राष्ट्रपति के निर्देश पर कुछ गुप्त अभियानों में भी इसकी भूमिका हो सकती है.
ब्रिटेन की MI6, जिसे Secret Intelligence Service यानी SIS भी कहा जाता है, विदेशों से जुड़ी खुफिया जानकारी जुटाती है. इसका काम सिर्फ जानकारी हासिल करना नहीं है. MI6 के अनुसार, उसके अधिकारी जानकारी की जांच और विश्लेषण करके उसे सरकार तक पहुंचाते हैं. इसका इस्तेमाल ब्रिटेन की राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति और आर्थिक हितों से जुड़े फैसलों में किया जाता है.
रूस में विदेशों से जुड़ी खुफिया जानकारी के लिए SVR यानी Foreign Intelligence Service प्रमुख एजेंसियों में से एक है.
इसका मुख्य क्षेत्र रूस की सीमाओं के बाहर से जुड़ी खुफिया जानकारी है. ऐसी जानकारी में दूसरे देशों की राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा से जुड़ी गतिविधियां शामिल हो सकती हैं. रूस की खुफिया व्यवस्था में अलग-अलग एजेंसियों की अलग जिम्मेदारियां हैं, इसलिए हर तरह का खुफिया काम SVR ही नहीं करती.
Mossad इजरायल की प्रमुख खुफिया एजेंसी है. इसके आधिकारिक विवरण के मुताबिक, इसका काम ऐसी खुफिया जानकारी जुटाना है, जो इजरायल की राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े फैसलों में मदद करे. Mossad खुफिया जानकारी जुटाने के साथ विदेशों में रणनीतिक अभियानों के लिए भी अपनी क्षमताओं का इस्तेमाल करती है. एजेंसी का काम दुनिया के अलग-अलग हिस्सों तक फैला हुआ है. इन एजेंसियों को देखकर एक बात समझ आती है आज किसी देश की सुरक्षा सिर्फ उसकी सीमा के अंदर की घटनाओं पर निर्भर नहीं करती. विदेशों में होने वाले राजनीतिक, सैन्य, तकनीकी और सुरक्षा से जुड़े बदलाव भी सीधे असर डाल सकते हैं. भारत में विदेशों से जुड़ी ऐसी जानकारी जुटाने की प्रमुख जिम्मेदारी R&AW की है.
1968 में जब रॉ बनी थी, तब सुरक्षा की बड़ी चिंताएं युद्ध, सीमा विवाद और पड़ोसी देशों की सैन्य गतिविधियों से जुड़ी थीं.आज तस्वीर काफी बदल चुकी है. अब खतरे सिर्फ सीमा पर सैनिकों की हलचल तक सीमित नहीं हैं. आतंकवाद, साइबर हमले, नई सैन्य तकनीक, समुद्री सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क और दूसरे देशों की रणनीतिक गतिविधियां भी किसी देश की सुरक्षा को प्रभावित कर सकती हैं. इसलिए आधुनिक खुफिया काम भी बदल गया है.अब जानकारी सिर्फ किसी व्यक्ति या गुप्त स्रोत से नहीं मिलती. तकनीक, संचार, सैटेलाइट से मिलने वाली तस्वीरें और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी भी किसी बड़े घटनाक्रम को समझने में मदद कर सकती हैं.
इसे एक आसान उदाहरण से समझिए. अगर किसी पड़ोसी देश में सैन्य गतिविधियां अचानक बढ़ने लगती हैं और भारत को इसकी जानकारी पहले ही मिल जाए, तो भारत के पास स्थिति को समझने और अपनी तैयारी करने के लिए ज्यादा समय होगा. लेकिन अगर जानकारी तब मिले जब हमला शुरू हो चुका हो, तो विकल्प काफी कम रह जाते हैं. यही वजह है कि बाहरी खुफिया एजेंसी किसी भी देश की सुरक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है. R&AW का मूल काम भी इसी सोच से जुड़ा है खतरा सामने आने का इंतजार करने के बजाय उसके संकेतों को पहले समझना.
21 सितंबर 1968 को R&AW की शुरुआत हुई थी. 2026 में इस एजेंसी को अस्तित्व में आए 58 साल पूरे हो गए हैं. इन वर्षों में दुनिया काफी बदल गई और भारत के सामने सुरक्षा की चुनौतियां भी बदलती गईं. लेकिन रॉ बनाने के पीछे जो मूल जरूरत थी, वह आज भी समझी जा सकती है. 1962 के युद्ध के बाद भारत ने महसूस किया कि दूसरे देशों में होने वाली महत्वपूर्ण गतिविधियों की जानकारी के लिए एक अलग और मजबूत व्यवस्था जरूरी है. इसी सोच से R&AW बनी और आर.एन. काओ ने इसकी पहली नींव रखी. रॉ की कहानी सिर्फ जासूसों और गुप्त अभियानों की कहानी नहीं है. यह उस सोच की कहानी है जिसमें भारत ने यह समझा कि देश की सुरक्षा के लिए खतरे के सामने आने का इंतजार नहीं किया जा सकता. उसके संकेतों को पहले समझना भी उतना ही जरूरी है. इसी वजह से 21 सितंबर 1968 की तारीख R&AW की स्थापना के संदर्भ में महत्वपूर्ण है.
न्यूज 24 पर पढ़ें एक्सप्लेनर, राष्ट्रीय समाचार (National News), खेल, मनोरंजन, धर्म, लाइफ़स्टाइल, हेल्थ, शिक्षा से जुड़ी हर खबर। ब्रेकिंग न्यूज और लेटेस्ट अपडेट के लिए News 24 App डाउनलोड कर अपना अनुभव शानदार बनाएं।