बिहार के जमुई जिले में जो हुआ, उसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया. यहां एक नाबालिग छात्रा के साथ यौन उत्पीड़न हुआ और उसके साथ मौजूद छात्र के साथ मारपीट की गई. इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसके आधार पर तीन नाबालिगों को हिरासत में लिया गया. इस वारदात के सामने आने के बाद एक बार महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सवाल उठ रहे हैं. आइए आपको बताते हैं कि भारत में छेड़छाड़ और दुष्कर्म की घटनाओं में कौन सा राज्य सबसे आगे है और आंकड़ों के मुताबिक, बिहार कौन से नंबर पर है.
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किन राज्यों में सबसे ज्यादा केस?
नेशनल क्राईम रिकॉर्ड्स ब्यूरो की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक, रेप और छेड़छाड़ के दर्ज मामलों की संख्या और दर के मामले में राज्यों के बीच काफी अंतर है. रेप के दर्ज मामलों की कुल संख्या के हिसाब से राजस्थान और मध्य प्रदेश सबसे ज्यादा आगे होते हैं. राजस्थान की गिनती रेप के हाई रेट वाले राज्यों में भी की गई है. ये दर प्रति लाख आबादी पर होने वाली घटना को मापती है. आबादी के मुताबिक भी रेप और छेड़छाड़ के दर्ज मामलों के आंकड़ों से भी अंतर आता है. जब कोई महिलाओं पर अभद्र टिप्पणियां, उन्हें गलत तरीके से छूता है या किसी तरह से उनकी गरिमा को ठेंस पहुंचाता है, तो ऐसे मामलों को आमतौर पर छेड़छाड़ कहा जाता है. ऐसे केस ओडिशा, महाराष्ट्र और यूपी जैसे राज्यों में सबसे ज्यादा दर्ज हुए हैं.
बिहार के क्या हालात हैं?
बिहार में अक्सर हत्या, चोरी-डकैती, लूटमार जैसी घटनाएं सुनने में आती हैं, लेकिन हैरानी की बात ये कि क्राइम में काफी आगे रहने वाले बिहार में प्रति लाख महिला आबादी पर रेप और छेड़छाड़ के दर्ज मामलों का रेट नेशनल एवरेज से नीचे रहा है. यही वजह है कि बिहार को रेप के कम दर्ज मामले वाले राज्यों में गिना जाता है. महिलाओं पर हो रहे अत्याचार और अपराध के मामलों में बिहार टॉप 10 राज्यों में भी शामिल नहीं है. बिहार आमतौर पर 12वें से 15वें स्थान के बीच आता है.
बिहार में महिलाओं के खिलाफ कौन से अपराध?
बिहार में महिलाओं के खिलाफ जो मामले दर्ज हैं, उनमें ज्यादातर किडनैपिंग और दहेज प्रताड़ना से जुड़े हैं. वहीं रेप के दर्ज मामले सिर्फ 12 प्रतिशत ही हैं. बिहार की राजधानी पटना में महिलाओं के खिलाफ अपराधों से जुड़े सबसे ज्यादा मामले दर्ज किए हैं. सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि बिहार में महिलाओं के खिलाफ अपराधों के केस दर्ज नहीं हो पा रहे हैं, शायद यही वजह है कि यहां पर काफी सारे केस सामने नहीं आ रहे. कई लोग परिवार की बदनामी, किसी दबाव या डर की वजह से शिकायत दर्ज नहीं करा रहे. ऐसे में सरकारी आंकड़ों में सभी घटनाएं रिकॉर्ड नहीं हो पा रही.
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