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डेंगू-मलेरिया का खौफ जीरो, क्या दुनिया में कोई ऐसा देश है जहां मच्छर न हो?

Mosquito Free Country: जिन देशों में मच्छरों का आतंक है, वहां डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया जैसी बीमारियां आम हैं, लेकिन क्या दुनिया में कोई ऐसा मुल्क हैं जहां इस खास कीड़े का नामोनिशान गायब है?

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Only Country Without Mosquitoes: कई दशकों तक आइसलैंड को दुनिया का इकलौता ऐसा मुल्क माना जाता था जहां मच्छर नहीं पाए जाते थे. यहां के अजीब मौसम की वजह से ये कीड़े अपना लाइफ साइकल पूरा नहीं कर पाते थे, जबकि यहां तालाब, दलदली इलाके और मच्छरों के पनपने की दूसरी जगहें मौजूद थीं.

हालांकि अक्टूबर 2025 में हालात बदल गए, जब साइंटिस्ट ने आइसलैंड की जमीन पर पहली बार मच्छर पाए जाने की पुष्टि की. इस खोज में ‘क्यूलिसेटा एनुलाटा’ (Culiseta annulata) नाम का मच्छर मिला, जो ठंड सहने वाली प्रजाति है और यूरोप के कुछ हिस्सों में आम है.

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आइसलैंड में मच्छर क्यों नहीं थे?

1. जमने और पिघलने का साइकल

यूरोप के कई इलाके ऐसे हैं जहां सर्दियां लंबी और लगातार जमी हुई बर्फ वाली रहती हैं, वहीं आइसलैंड में मौसम बार-बार जमने और पिघलने वाला रहता है. इससे मच्छरों का लाइफ साइकल डिस्टर्ब हो जाता है क्योंकि उनके अंडों, लार्वा और प्यूपा को डेवलप होने के लिए थोड़े स्टेबल कंडीशन की जरूरत होती है.

2. छोटी और ठंडी गर्मियां

मच्छरों को अपनी ग्रोथ पूरी करने के लिए काफी गर्म मौसम की जरूरत होती है. आइसलैंड में गर्मियां थोड़ी ज्यादा ठंडी होती हैं और गर्म मौसम का पीरियड कम होता है, जिससे प्रजनन के लिए बहुत कम वक्त मिल पाता था.

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3. सर्दियों का अनिश्चित मौसम

कुछ ठंडे इलाकों में मच्छर सर्दियों में डॉरमेंट स्टेट में जिंदा रहते हैं और वसंत ऋतु में बर्फ पिघलने पर बाहर निकलते हैं. आइसलैंड में सर्दियों में अचानक बर्फ पिघलने और फिर दोबारा जमने से इस प्रॉसेस में रुकावट आ सकती है.

4. ब्रीडिंग के लिए लिमिटेड स्टेबल कंडीशन

हालांकि आइसलैंड में कई झीलें, तालाब और दलदली इलाके हैं, लेकिन इनमें से कई वाटर बाडीज या तो बहुत ठंडे हैं, अस्थिर हैं या बार-बार जमते रहते हैं, जिससे मच्छरों का लगातार प्रजनन मुश्किल हो जाता है.

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मच्छरों का कभी-कभार दिखना

कभी-कभार मच्छर आइसलैंड पहुंच तो जाते थे, लेकिन वहां अपनी आबादी नहीं बना पाते थे. 1980 के दशक में ग्रीनलैंड से आए एक विमान के अंदर एक मच्छर मिलने की खबर आई थी. एक अहम खोज अक्टूबर 2025 में हुई, जब रेकजाविक (Reykjavík) के नॉर्थ में क्योज (Kjós) इलाके में 3 मच्छर पाए गए. रिसर्चर्स ने उनकी पहचान ‘क्यूलिसेटा एनुलाटा’ के तौर पर की. ये प्रजाति ठंड सहने वाली मानी जाती है और इस इलाके में इससे बीमारियां फैलने की जानकारी नहीं है. 2026 तक एक्सपर्ट्स का कहना है कि अभी भी इस बात का कोई पक्का सबूत नहीं है कि आइसलैंड में मच्छरों ने अपनी स्थायी आबादी बना ली है.

क्लाइमेट चेंज सब कुछ बदल सकता है

आइसलैंड का बढ़ता तापमान आखिरकार मच्छरों के लिए फेवरेबल कंडीशन पैदा कर सकता है. गर्म तापमान और बिना जमे रहने वाले लंबे समय से इन कीड़ों को ब्रीडिंग करने और जिंदा रहने के लिए ज्यादा वक्त मिल सकता है. वैज्ञानिकों का ये भी कहना है कि इंटरनेशनल ट्रांसपोर्टेशन में बढ़ोतरी, कीड़ों के आइलैंड तक पहुंचने का एक और संभावित जरिया हो सकता है. इसलिए 2025 की ये खोज एक अहम याद दिलाती है कि तापमान और इकोसिस्टम में बदलाव के साथ, आइसलैंड की अनोखा नेचुरल बैरियर भी शायद हमेशा वैसा न रहे.

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First published on: Sep 22, 2026 11:23 PM

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About the Author

Shariqul Hoda

न्यूज़ 24 डिजिटल में शारिकुल होदा सीनियर सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं. मुख्य तौर पर वह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खबरें लिखते हैं. शारिकुल ने 2008 में दूरदर्शन में बतौर इंटर्न अपनी शुरुआत की, इसके बाद वह दैनिक जागरण, टीवी टुडे नेटवर्क, जनसंदेश, श्री न्यूज़, भारत खबर, स्पोर्ट्सकीड़ा, WION और ज़ी न्यूज़ में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. उन्होंने 3 लोकसभा चुनाव और कई विधानसभा चुनाव से लेकर देश की बड़ी घटनाओं को कवर किया है. अपने डेढ़ दशक के मीडिया करियर में शारिकुल ने देश की राजनीति, इंटरनेशनल डिप्लोमेसी, खेलकूद से जुड़ी घटनाओं की अच्छी समझ हासिल की है. कितने साल का तजुर्बा: 16 साल शिक्षा: शारिकुल ने बैंगलोर यूनिवर्सिटी (आचार्य इंस्टीट्यूट) से बीए जर्नलिज्म और गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी (एपीजे इंस्टीट्यूट) से मास्टर्स इन जर्नलिज्म और मास कम्यूनिकेशन की पढ़ाई की है.

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