आज के दौर में अगर हमें चाय भी पीनी हो या राशन खरीदना हो, तो जेब से पर्स निकालने की जरूरत नहीं पड़ती, बस जेब से फोन निकाला, QR कोड स्कैन किया और UPI से पेमेंट कर दी. लेकिन जरा सोचिए, digital payment से पहले हम पूरी तरह से कागजी नोटों (Paper Currency) और सिक्कों पर निर्भर थे.
आज भी जब हमारे हाथ में नोट आते हैं, तो कभी न कभी दिमाग में यह सवाल जरूर आता है कि आखिर दुनिया में सबसे पहले कागजी नोट किस देश ने शुरू किए थे?
अगर आप सोचते हैं कि यह शुरुआत यूरोप या अमेरिका से हुई, तो आप बिल्कुल गलत हैं. आइए, जानते हैं कि नोटों का इतिहास कहां से शुरू हुआ और यह पूरी दुनिया में कैसे फैला.
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भारी-भरकम सिक्कों से जब परेशान हुए लोग
सदियों पहले व्यापार और लेन-देन का पूरा काम धातु (तांबे, चांदी और सोने) के सिक्कों से चलता था. अब सोचिए, अगर किसी व्यापारी को कोई बड़ा सामान खरीदना हो, तो उसे बोरियों में भरकर भारी-भरकम सिक्के लादकर ले जाने पड़ते थे. सिक्कों को साथ लेकर घूमना बेहद मुश्किल, थकाऊ और जोखिम भरा काम था. इसी परेशानी का हल निकालने की सोच में से जन्म हुआ- कागजी नोटों (Paper Currency) का.
चीन बना दुनिया का पहला देश: जियाओजी (Jiaozi) का जन्म
दुनिया में सबसे पहले कागज के नोट चलाने का श्रेय जाता है चीन (China) को. 11वीं सदी की शुरुआत में, चीन के सोंग राजवंश (Song Dynasty) के दौरान सिचुआन (Sichuan) इलाके के व्यापारियों ने इसका एक नायाब तोड़ निकाला. भारी सिक्कों की जगह उन्होंने कागज की हल्की रसीदें या पर्चियां इस्तेमाल करना शुरू कर दिया, जिन्हें ‘जियाओजी’ (Jiaozi/Xiaoji) कहा जाता था.
व्यापारी आसानी से इसे जेब में रखकर लंबा सफर तय करने लगे और आपस में सामान खरीदने-बेचने लगे.
जब सरकार ने संभाली कमान
जब चीनी सरकार ने देखा कि व्यापारी इस कागजी करेंसी से बहुत खुश हैं और उनका व्यापार आसान हो गया है, तो सरकार ने खुद आधिकारिक तौर पर जियाओजी नोट छापना शुरू कर दिया. इस तरह दुनिया का पहला राष्ट्रीय कागजी मुद्रा तंत्र (National Paper Currency System) अस्तित्व में आया.
नोटों का दुरुपयोग या नकली नोट न बनें, इसके लिए चीनी सरकार ने इन पर एक एक्सपायरी डेट (Expiration Date) भी तय कर दी थी, जिससे लोगों का भरोसा इन कागजी नोटों पर और पक्का हो गया.
इसके बाद, युआन राजवंश (Yuan Dynasty) के दौर में महान सम्राट कुबलई खान (Kublai Khan) ने इस कागजी करेंसी को पूरे साम्राज्य में अनिवार्य (Mandatory) कर दिया, जिससे टैक्स और व्यापार संभालना बेहद आसान हो गया.
यूरोप कैसे पहुंचे कागज के नोट?
जब 13वीं सदी में मार्को पोलो (Marco Polo) जैसे मशहूर यूरोपीय यात्री चीन पहुंचे, तो वे वहां कागज के पैसे का इस्तेमाल देखकर दंग रह गए. उन्होंने यूरोप वापस जाकर इस अनोखी व्यवस्था के बारे में लिखा. शुरुआत में यूरोपीय लोगों को लगा कि कागज का टुकड़ा भला पैसे की जगह कैसे ले सकता है, इसलिए वे थोड़े झिझके. लेकिन 16वीं सदी में जब यूरोप में सिक्कों की भारी कमी हो गई, तो उन्हें भी यह आइडिया समझ में आने लगा.
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17वीं सदी में स्वीडन (Sweden) कागजी नोट जारी करने वाला पहला यूरोपीय देश बना. इसके बाद धीरे-धीरे पूरी दुनिया ने कागज के नोटों को अपना लिया.
तो अगली बार जब आप अपने हाथ में 10, 50 या 500 रुपये का नोट थामें, तो याद रखिएगा कि इस हल्के से कागज के टुकड़े के पीछे चीन के व्यापारियों की 1000 साल पुरानी जुगाड़ और सोच छिपी है. हालांकि अब दौर डिजिटल हो गया है, लेकिन इतिहास के पन्नों में नोटों का यह सफर बेहद दिलचस्प रहा है.