बंगाल की सियासत में नंदीग्राम सिर्फ एक विधानसभा सीट नहीं है, वह जमीन है जिसने राज्य के सियासी इतिहास की धारा बदल दी. साल 2007 के भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन ने 34 साल पुरानी वाममोर्चा सरकार की चूलें हिला दी थीं. इसी सीट ने ममता बनर्जी को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाया था. नंदीग्राम को ममता बनर्जी का गढ़ माना जाता रहा है. लेकिन 2021 के बंगाल विधानसभा चुनाव ममता बनर्जी उसी सीट से हार गईं. 2026 के विधानसभा चुनाव में भी ममता बनर्जी की पार्टी का उम्मीदवार इस सीट से नहीं जीत पाया.
2007 का वो खूनी संघर्ष
2005 में नंदीग्राम में केमिकल फैक्ट्री बनाने का प्रस्ताव आया. साल 2007 की शुरुआत में वाममोर्चा सरकार ने इंडोनेशिया के सलीम ग्रुप के एक केमिकल हब के लिए नंदीग्राम की उपजाऊ जमीन अधिग्रहण करने की योजना बनाई.लेकिन वहां के किसान इस प्रोजेक्ट के खिलाफ थे. ममता बनर्जी भी वाम मोर्चे की सरकार के इस फैसले के खिलाफ ममता बनर्जी किसानों के साथ खड़ी हो गईं. इस प्रोजेक्ट को लेकर हिंसक आंदोलन हुआ था. आंदोलन में पुलिस फायरिंग में 14 लोगों की जान चली गई थी. इस मुद्दे को ममता बनर्जी ने काफी जोर-शोर से उठाया था. उनका नारा 'मां, माटी, मानुष' पूरे बंगाल का जनआंदोलन बन गया.
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साल 2011 के चुनाव में ममता बनर्जी ने वाम मोर्चा की 34 साल से काबिज सरकार को हिलाकर रख दिया. कहा जाता है कि ममता बनर्जी इसी आंदोलन की बदौलत सीएम की कुर्सी तक पहुंची थीं. 2011 में सीएम की कुर्सी पर बैठने के बाद 2026 तक उनकी सरकार रही.
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अधिकारी परिवार का दबदबा
नंदीग्राम आंदोलन में ममता बनर्जी राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर बड़ा चेहरा जरूर थीं, लेकिन जमीन पर लड़ाई शिशिर अधिकारी और उनके बेटे शुभेंदु अधिकारी लड़ रहे थे. पूर्व मेदिनीपुर और नंदीग्राम के इलाके में हमेशा अधिकारी परिवार का काफी प्रभाव रहा है. ममता बनर्जी ने सत्ता में आने के बाद शुभेंदु अधिकारी को मंत्री बनाया. ममता सरकार में उनका काफी दबदबा था.
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राइट हैंड बना सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी
2019 के लोकसभा चुनाव के बाद जब तृणमूल के भीतर अभिषेक बनर्जी का प्रभाव बढ़ा, तो शुभेंदु अधिकारी और पार्टी नेतृत्व के बीच दरार खुलकर सामने आ गई. दिसंबर 2020 में शुभेंदु अधिकारी ने टीएमसी से इस्तीफा देकर भाजपा का दामन थाम लिया. इसके बाद शुभेंदु ने सीधे तौर पर ममता बनर्जी को उनके ही गढ़ में चुनौती दी.
2021 के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी ने नंदीग्राम से खुद चुनाव लड़ने का फैसला किया. उन्होंने अपनी पारंपरिक भवानीपुर सीट छोड़कर नंदीग्राम से चुनाव लड़ने का फैसला किया, लेकिन उनका यह फैसला सही साबित नहीं हुआ. शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को हरा दिया. हालांकि, ममता बनर्जी बहुमत हासिल करके मुख्यमंत्री बन गईं.
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2026 में क्या हुआ?
2026 में तृणमूल कांग्रेस जब विधानसभा चुनाव हार गईं तो पार्टी में फूट पड़ी. पार्टी दो धड़ों में बंट गई. बगावत तृणमूल कांग्रेस विधायक दल में शुरू हुई थी और बाद में संसद तक पहुंच गई थी. जून में, 58 बागी विधायकों ने ममता खेमे के उम्मीदवार सोवनदेब चट्टोपाध्याय के बजाय पार्टी से निकाले गए नेता रितब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता चुना और विधानसभा अध्यक्ष से मान्यता हासिल की. पांच दिन बाद, यह बगावत संसद तक पहुंच गई. वरिष्ठ नेता काकोली घोष दस्तीदार की अगुवाई में 20 लोकसभा सदस्यों ने नेशनलिस्ट सिटीजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) पार्टी का दामन थाम लिया.
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क्यों हो रहे नंदीग्राम में उपचुनाव?
2026 के विधानसभा चुनाव में नंदीग्राम सीट से शुभेंदु अधिकारी ने टीएमसी उम्मीदवार को हराया था. शुभेंदु ने नंदीग्राम और भवानीपुर दोनों सीटों पर चुनाव लड़ा था और दोनों ही जीत गए थे. इसके बाद उन्होंने भवानीपुर सीट अपने पास रखी और नंदीग्राम सीट छोड़ दी.
नंदीग्राम उपचुनाव के लिए इस सीट पर ममता बनर्जी ने अपने खेमे से संचिता प्रधान डे को उम्मीदवार बनाया था. लेकिन प्रधान डे ने अपना नामांकन वापस ले लिया. जिसके बाद ममता बनर्जी ने फैसला किया कि उनकी पार्टी कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को समर्थन देने का ऐलान किया. लेकिन इस ऐलान के कुछ समय बाद ही मिलन प्रधान को 2007 के एक मामले में गिरफ्तार कर लिया गया.